************************************************* यह न पूछो ,जिन्दगी को किस तरह से ,जीया था मैने , ज़माने की जुल्मों - सितम , खामोशी से , सहा था मैने . हर ज़ख्म , हर दर्द दिये थे , ज़माने वालों ने मुझे , जिनके ज़ख्मों पर,प्यार से मरहम,लगाया था मैने . कतई ईल्म न था , दुनिया वाले इतने , खुदगर्ज़ होंगे , जबकी उनके गमों को,अपना समझकर,उठाया था मैने . जीते -जी हरवक्त ,खोदते ही रहें , वही कब्र मेरा , जिन्हे जीने का , सही अंदाज , सिखाया था मैने . किसी बोझ की तरह ,उठाए जा रहें हैं ,ज़नाज़ा मेरा , जिनके दर्द से ,तड़पते काँधों को , सहलाया था मैने . मालूम हैं , जल्द ही मिट्टी तले , दफ़ना जाएंगे मुझे , कुछ पल के लिये सही,लोगों को,अपना बनाया था मैने . रूह तो फ़ना हो चुकी,अब जिस्म भी,अलविदा "आनंद", फक्र हैं ,जिन्दगी को सच की राह में , बिताया था मैने .